वित्तीय क्षेत्र में , पिछले कई वर्षों से दक्षिण पूर्व रेलवे का बिलासपुर मंडल , भारतीय रेल के लिये सर्वाधिक आय अर्जित करने का महत्त्व पा रहा है। इधर साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में भी कुछ महत्वपूर्ण शुरुआत हुयी है। हिन्दी के क्षेत्र में विशेष रूप से।
राष्ट्रीयकरण से पहले वाला बंगाल-नागपुर रेलवे अब दक्षिण-पूर्व रेलवे के अंतर्गत आता है। भाषा की दृष्टि से बिलासपुर रेल मंडल (डिवीजन) का प्रत्यक्ष संपर्क ओडिया, तेलुगु और मराठी भाषी प्रसारों के साथ है। आजादी के फ़ौरन बाद शरन्यक की तलाश में आये पंजाबी और बंग भाषी लोगों को भी उस समय सब से अधिक रेलवे की सेवाओं में ही खपाया जा सका था। अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में तमिल और मलयालम बोलने वालों क्र नाम भी बहुत बड़ी तादाद में इस रेल मंडल के वेतन भुगतान प्रपत्र (पे रोल ) पर दर्ज हैं । इस तरह, संभवतः भाषाई आधार पर बिलासपुर रेल मंडल के अंतर्गत सर्वाधिक विभिन्न भाषाओं वाली आबादी निवास करती है। इसलिए, यहाँ हिन्दी के सम्बन्ध में शासकीय अथवा सांस्कृतिक स्तर पर किये गए किन्हीं भी कार्यों के महत्त्व को परिणाम के साथ जोड़ कर देखा-परखा जा सकता है।
त्रिभाषा फार्मूले के अनुसार बिलासपुर रेल मंडल अपने कर्मचारियों के लिये हिन्दी और उर्दू के अतिरिक्त बंगला,ओडिया, मराठी,तमिल, तेलुगु और मलयालम भाषाओं की कक्षाएं चला रहा है। इन भाषाओं की बाकायदा परीक्षाएं होती हैं और इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले कर्मचारियों के लिये उचित 'प्रोत्साहन' (इंसेंटिव ) का प्रावधान है ।
हिन्दी में विकास को गति प्रदान करने के लिये दक्षिण-पूर्व रेलवे ने विवेकशील प्रयास किये हैं । पिछले वर्ष जब हिन्दी दिवस (१४ सितम्बर) में रेलवे के अंतर्गत होने वाले लिखा-पढी के 'अधिकतम संभव' कार्यों को हिन्दी में निपटाने का लक्ष्य निर्धारित किया जा रहा था , उस समय दक्षिण पूर्व रेलवे ने इस बात की सतर्कता रखी कि टिकट खिड़कियों से अथवा चलती रेल में बनायी जाने वाली रसीदें भी यथासंभव हिन्दी में लिखी जाएँ -- लेकिन ध्यान रखा जाए कि वहाँ हिन्दी पढी जा सकती है ।
बिलासपुर रेल मंडल ने इन विवेकशील प्रयासों को साहित्यिक और सांस्कृतिक स्वरुप प्रदान किया है । यह अकेला रेल मंडल है जो हिन्दी भाषा में नियमित रूप से एक साहित्यिक त्रैमासिक (पत्रिका) 'दीक्षा ' का प्रकाशन कर रहा है ।
इस वर्ष २३ से ३० जनवरी तक बिलासपुर रेल मंडल ने हिन्दी सप्ताह आयोजित किया और समारोह के उदघाटन के लिये बंगला उपन्यासकार श्री विमल मित्र को अपने यहाँ आमंत्रित किया। विमल मित्र का बिलासपुर आना इस समारोह से सम्बंधित पक्षों को बहुकोणीय दृष्टि देता है। एक तो यह कि हिन्दी सप्ताह का उदघाटन साहित्य का एक व्यक्ति कर रहा था। दूसरा यह कि वह व्यक्ति अहिन्दी भाषी है। तीसरा यह कि विमल मित्र का बिलासपुर के साथ डेढ़ दशक जितना पुराना सम्बन्ध है। बहुत बरस पहले वह यहाँ रेल विभाग की नौकरी (स्वयं विमल मित्र द्वारा प्रयुक्त शब्द) में थे। यह किसी आकस्मिक संयोग से बहुत आगे की बात है कि आज ऊन्हें सम्मान वहाँ मिल रहा था जो स्थान उनके प्रारम्भिक जीवन के साथ सीधे जुडा हुआ है।
'सुरसतिया' के शिल्प और सूत्र विमल मित्र के बिलासपुर के जीवन अनुभवों से जुड़े हैं। इस उपन्यास में 'सुरसतिया' के चरित्र चित्रण को लेकर , बाद में छत्तीसगढ़ में बड़ी प्रतिक्रया हुयी थी। और रायपुर में तो उस पत्र (साप्ताहिक हिन्दुस्तान ) की प्रतियां भी जलाई गयी थीं , जिसमें यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था। आशंका थी कि सुरसतिया के कथा देश में सम्मान के दौरान उपन्यासकार का सामना सुरसतिया के विवादग्रस्त प्रश्नों से होगा। लेकिन एक अच्छी बात यह हुयी कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। बिलासपुर आने के बाद विमल मित्र रायपुर गए थे । और भिलाई भी, जहां उनकी 'लड़की की लड़की' रहती है , जो अभी छोटी बच्ची है और जिसे वह बहुत प्यार करते हैं। वहाँ भी कोई आशंकित मुठभेड़ नहीं हुयी। अलबत्ता हिन्दी तथा बंगला पाठकों की संख्या और विमल मित्र के 'उपन्यासों के बाजार' से समबन्धित कुछ प्रश्न वहाँ के स्थानीय पत्रों की ओर से किये गए।
विमल मित्र ने बताया कि हिन्दी बाजार के मुकाबले उनके उपन्यास बंगाल में अधिक बिकते हैं , क्योंकि वहाँ किताबें खरीद कर पढ़ने वाले पाठकों का एक बहुत बड़ा समुदाय रहता है। और साहित्य पढ़ने वाले उस समुदाय के निर्माण का श्री उन्होंने रविन्द्र बाबू को दिया।
यहाँ आकर बात थोड़े उलझाव में पडी क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में रविन्द्र नाथ ठाकुर और शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनात्मक प्रवृत्तियों को सामंतवाद और जनवाद के चौखटे में कस कर पुनरीक्षित करने के सुगठित प्रयास हुए हैं। विमल मित्र ने इन प्रयासों के सम्बन्ध में कुछ न कह कर एक बात कही कि रविन्द्र बाबू लेखकों के लेखक थे और शरत पाठकों के लेखक थे।
समारोह का उदघाटन करते हुए अपने भाषण में उन्होंने कहा था -- मैं कहानी लिखता हूँ इसलिए अपनी बात कहानी में कहूंगा। और उन्होंने पंचतंत्र की वह कहानी सुनायी कि मनुष्य ने किस तरह कुटिलता पूर्वक बैल, गधे और कुत्ते के जीवन -बर्ष अपने लिये हथिया लिये । इस कहानी के बाद उन्होंने कहा -- अब मैं कुत्ते का जीवन जी रहा हूँ ।
फिर उन्होंने अपना मंतव्य स्पष्ट किया कि जिस तरह कुत्ता चौकसी का काम करता है, जीवन के इस चौथे हिस्से में पहुँच कर वह भी चौकसी का काम कर रहे हैं। जो कुछ आस-पास घाट रहा है, साहित्य में हो रहा है उस पर वह दृष्टि रखे हुए हैं । अपनी हिन्दी के सम्बन्ध में विमल मित्र ने एक रोचक बात बतायी -- मैं हिन्दी में पत्र लिखता हूँ, अपनी उस नातिन के लिये जो भिलाई में रहती है और मुझे हिन्दी में ही लिखती है। '
इस बात को एक पारिवारिक संस्मरण से आगे ले जा कर विचार करें तो इसका अर्थ एकदम साफ़ हो जाता है कि हिन्दी आगामी पीढी की भाषा है।
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( मेरी यह समाचार- टिप्पणी टाइम्स ऑफ़ इंडिया, नयी दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिन्दी समाचार साप्ताहिक 'दिनमान' -- संपादक , रघुवीर सहाय , २६ मार्च-` अप्रैल १९७८, के अंक में प्रकाशित हुयी थी। उस समय बिलासपुर रेल मंडल दक्षिण पूर्व रेल के अंतर्गत था। )
2 टिप्पणियाँ:
जरूरी अभिलेख सामने आया है, अच्छा लगा.
वाह! यदि अंत तक न पढ़ा होता तो आज की कहानी मान सकता था. वैसे आजकल क्या स्थिति है? क्या अभी भी मंडल तेलगु, मलयालम, और अन्य सारी भाषाओँ में पढाता और परीक्षाएं आयोजित करता है? अलबत्ता चलती ट्रेनों में या प्लेटफॉर्म पर हिंदी में रसीदें काटने वाले मुझे कभी नहीं दिखाई दिए.
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