भारतीय साहित्य के प्रतिष्ठित पुरस्कार "ज्ञानपीठ पुरस्कार" से सम्मानित असमिया लेखिका इंदिरा गोस्वामी का उपन्यास "अहिरन" अभी मेरे हाथ आया। अहिरन छत्तीसगढ़ की एक छोटी सी नदी है। छोटी, लेकिन सुन्दर। यह, छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी "तुम्मान" के पास से निकलती है और नव- औद्योगिक नगर "कोरबा" के पास, एक बड़ी और बारहोंमासी नदी "हसदो" में जाकर समाहित हो जाती है।अहिरन के नाम ने मुझे इस उपन्यास की तरफ आकृष्ट किया. और मेंने को मेंने इसछोटे से उपन्यास को अपनी इस उत्सुकता के साथ पढ़ा कि इसमें छत्तीसगढ़ मिलेगा। और इस संतोष के साथ पढ़ा कि इंदिरा गोस्वामी जैसी उस प्रतिष्ठित लेखिका ने छत्तीसगढ़ की एक नदी को अपना विषय बनाया है, जो छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ के लोगों के बारे में जरूर जानती होंगी। क्योंकि वो असम की हैं और वहाँ के चाय बागानों में काम करने वाले छत्तीसगढ़ी मज़दूरों को "बिलासपुरिया लेबर" के नाम से जाना जाता है। इस बात को तो अब १०० बरस से भी ऊपर होने को आये।
इस छोटे से उपन्यास में कम से कम एक वर्ष के बारहों महीने का ऋतू चक्र शामिल है, एक वृद्ध की मौत और एक बच्चे का जन्म शामिल है। और किसी एक स्थान को उसकी स्थानिकता में, उसकी स्थानीय संरचना में जानने- समझने के लिये इतना समय पर्याप्त माना जा सकता है। लेकिन "अहिरन" में यहाँ के रीति-रिवाज, यहाँ की प्रथा-परम्पराएं, औरअपने परिवेश के साथ यहाँ के लोगों के उन आत्मीय संबंधों के संकेत नहीं मिलते जिनसे किसी स्थानीयता को उसकी अपनी जातीय चारित्रिकता में पहिचाना जाता है। अलबत्ता, इंदिरा जी ने अपनी सचेतनता में और इरादे के साथ माओत्से तुंग के विचारों के लिये इस उपन्यास में जगह बनाने की ऐसी कोशिश की है जिस की यहाँ के उस सामाजिक परिवेश में साथ संगति नहीं बन पाती जो उपन्यास की कथा-भूमि भी है।
यहाँ, इंदिरा जी ने असम के सुधारक संत शंकर देव का कोई कथन उद्दृत किया होता तो वह अपनी संगति में यहाँ ग्राह्य होता। अहिरन के जल से जुड़े हुए स्तानीय जन-जातीय समाज को शंकरदेव के विचार वैसे ही अपने नजदीक लगते जैसे गहिरा गुरु का सुधारवादी अभियान, जो थोड़े समय का जरूर था लेकिन प्रभावशाली था।
किसी रचना-साहित्य में अपने यहाँ की स्थानिकता के उल्लेख को यहाँ संतोष और आभार के साथ ग्रहण किया जाता है। स्वतान्त्रता संग्राम के दिनों में पंडित माखन लाल चतुर्वेदी को बिलासपुर जेल में ताखा गया था तब उन्हों ने वहाँ एक कविता लिखी थी। उसमें बिलासपुर उल्लिखित हुआ। या बिलासपुर से गुजरते हुए रविन्द्र नाथ ठाकुर ने के कविता लिखी और उसमें बिलासपुर का उल्लेख किया। यहाँ के लोगों ने इन उल्लेखों को अपने लिये ऐतिहासिक धरोहरों की तरह सहेजा है। इंदिरा गोस्वामी की ही तरह अमृता प्रीतम भी कुछ समय के लिये इधर आयी थीं और उन्होंने दो कहानियां लिखी थीं-- "लटिया की छोकरी" और "गांजे की कली" इन दोनों को इतनी अपनी मान कर अपनाया गया कि इन पर यहाँ चर्चाएँ होती रहीं। और इनमें से एक पर तो फिल्म बनाने की बात भी चल रही है।
यहाँ बंगला उपन्यासकार बिमल मित्र को भी , उनके एक उपन्यास "सुरसतिया" के लिये याद किया जाता है, जो उन्होंने यहाँ रेलवे में अपनी नौकरी के दौरान लिखा था। उसके किसी प्रसंग पर उस समय , छत्तीसगढ़ में विवाद की स्थितियां भी बनी थीं। और "सुरसतिया" की प्रतियाँ जला कर कुछ लोगों ने विरोध भी जताया था। लेकिन बाद में उसे एक गैर-जरूरी विवाद मनाने में भी यहाँ के लोगों ने परहेज नहीं किया।
"अहिरन" के प्रति मैं अपनी इस उत्सुकता के साथ भी आकृष्ट हुआ था कि अपने आभार प्रकट करने के लिये मुझे वहाँ कोई खुली हुई और निर्विरोध जगह मिलेगी। लेकिन यह मेरी विफलता कि मैं वैसी कोई जगह वहाँ नहीं ढूढ़ पाया। अब मैं इस असमंजस में हूँ कि अपनी इस विफलता से इंदिरा गोस्वामी जैसी एक इतनी बड़ी लेखिका को कैसे अवगत कराऊँ ?
2 टिप्पणियाँ:
NICE.
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Happy Dushara.
VIJAYA-DASHMI KEE SHUBHKAMNAYEN.
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MOBILE SE TIPPANI DE RAHA HU.
ISLIYE ROMAN ME COMMENT DE RAHA HU.
Net nahi chal raha hai.
इंदिरा गोस्वामी की "अहिरन" कुल मिलाकर निराशाजनक ही मानी जानी चाहिए उनका इमेल किया जा सकता है.
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