असम के रंगीले पर्व
'बिहू' के अवसर पर आज मैं अपने उन सभी मित्रों के साथ , उन के उत्सव में शामिल होना चाहता हूँ,जो वहां इस पर्व को मना रहे होंगे और अपने उत्सव में मुझे शामिल करना चाहेंगे । अपने एक मित्र माखन लाल दास से तो मैं यह भी उम्मीद करता हूँ कि वो
, इस पर्व पर मेरी बधाई और शुभ कामनाएं सुआलकुसी के अरुण डेका तक , उस की पत्नी सानू तक और उन के पूरे परिवार तक पहुंचाने का कोई उपाय भी करेंगे।
कुछ वर्षों पहले 'बिहू' मनाने के लिये मैं असम गया था। वहाँ हर कोई यह समझ रहा था कि मैं'बिहू' देखना चाहता हूँ। तब भूपेन हजारिका जीवित थे और उस वर्ष गुवाहाटी में 'बिहू उत्सव' के एक मंडप में , लता मंगेशकर के साथ उनके गायन का कार्यक्रम आयोजित था। जानकार लोगों ने मुझे सुझाया कि 'बिहू' देखने के लिये मुझे वहीं जाना चाहिए। यह बात मुझे निराश भी कर रही थी और उदास भी बना रही थी । या तो मैं अपनी भावनाएं उन तक नहीं पहुंचा पा रहा था या फिर मुझे मंजूर नहीं किया जा रहा था।
वहाँ, डिब्रूगढ़ में अंग्रेजी की प्राध्यापिका और प्रसिद्द उपन्या 'स्वर्णलता' की पुरस्कृत लेखिका डाक्टर तिलोत्तमा मिश्र ने बताया कि 'बिहू' का पारंपरिक रूप अभी ऊपरी असम के इस हिस्से में बचा हुआ है लेकिन उग्रवादी गतिविधियों के किसी भी बाहरी के लिये सुरक्षा को संदिग्ध बना दिया है। अलबत्ता, उनके साथ इस विषय पर मेरी अच्छी बातचीत हो सकी कि लोक कला रूपों का 'मंडप' पर पहुँचना और उसका प्रदर्शनात्मक (फरमाइशी) हो जाना उस कला-रूप के लिये कितना हितकारी है अथवा नहीं।
तब अपनी निराशा और उदासी से बचाने का एक उपाय मैं ने किया था और, असम के विश्व प्रसिद्द रेशम 'मूगा' के गाँव -- सुआलकुसी जा पहुंचा। वहां मैं किसी को नहीं जानता था। लेकिन मेरे पास एक विश्वास था कि 'बिहू' ग्राम्य संस्कृति का पर्व है, इसलिए एक पारंपरिक गाँव में उसकी परम्परा अभी, किसी ना किसी रूप में बाकी होगी। और शायद वहाँ मुझे शामिल भी किया जा सकेगा। वहाँ अरुण डेका मुझे मिला , जिसके साथ, पहले कभी मैं नहीं मिला था। अरुण डेका ने और उसकी पत्नी सानू ने और उन के पूरे परिवार ने मुझे जिस तरह अपनाया व मेरे विश्वास से कहीं अधिक था जिसे सम्हाल पाना मेरे लिये भारी था। तब भी और आज भी है। एक ही सूरत बची थी कि वह स्नेहसिक्त अपनापन मैं अपने साथ ले आऊँ और अपनी उन स्मृतियों में सम्हाल लूं जो कभी धूमिल नहीं होंगी। वह हरापन अभी तक वैसे का वैसा हरा और गीला बना हुआ है।
कोलकता से प्रकाशित होने वाले हिंदी मासिक 'वागर्थ' के तत्कालीन संपादक डाक्टर प्रभाकर श्रोत्रिय
ने असम का मेरा यात्रा संस्मरण 'मायावी, कामरूप का रूप' अपने यहाँ लिया था। उसके कुछ अंश 'बिहू' के अवसर पर मैं अपने उन सभी मित्रों के साथ साझा करना चाहूगा, जो 'बिहू' मनाते हैं और किसी को अपने साथ शामिल करने में विश्वास करते हैं। मुझे विश्वास है कि दिसंबर २००१ के 'वागर्थ' के पृष्ठ क्रमांक ७५ और ७६ के ये कुछ अंश आपको भी स्पर्श करेंगे--
अरुण डेका का पूरा परिवार मेरे पास जुट गया है। मुझे लगा कि निबंध पढ़ कर 'बिहू' को समझने प्रयास कर रहा एक अतिथि उन के लिये अचरज पैदा कर रहा होगा। लेकिन अरुण की पत्नी ने सब सहज बना दिया। उसका नाम सानू है। सानू रूपवती है और घर में उस की चलती है। घर में अरुण भी, मुझे, उस पर आश्रित दिखा। मैंने सानू से पूछा -- 'बिहू' में क्या क्या होता है ?'
सानू समझाने लगी- सुबह उठ कर नदी में स्नान करते हैं । नये कपडे पहिनते हैं। 'नाम घर' में जा कर पूजा करते हैं। गाय की पूजा करते हैं। उसको खिलाते हैं। 'पीठा' खाते हैं। फिर घरों में जाकर 'बिहू-बिहू' पुकारते हैं। और नाचते हैं। दान ग्रहण करते हैं। '
(पृष्ट ७५)
इस परिवार में, जहाँ मैं अकस्मात् ही अतिथि हूँ, कौन भक्त होगा और कौन परम भक्त ? सोचता हूँ तो उलझता हूँ। बिमल मित्र का बंगला उपन्यास 'पति परम गुरु'। यहाँ, वह गुरु ना कुछ सस्मझ रहा है न कुछ समझा रहा है। समझना-समझाना जो भी है, वह पत्नी ही कर रही है।
अपनी समझ में सानू, मुझे हिंदी में ही समझा रही होगी। फिर भी मैं मूढ़ मति, समझ नहीं रहा हूँ। इस पर उस ने झुंझलाहट से देखा। तब अरुण ने उसे बतलाया कि वह तो असमिया में बोले जा रही है। इस पर वह अपने पति पर नाराज हो गयी -- तो फिर, तुम क्या कर रहे थे ?'
अरुण हंसने लगा-- तेरे सामने मेरी क्या चलती है ?'
मेरा अनुमान प्रमाणित हो गया कि घर में सानू की ही चलती है। वह फिर बताने लगी-- जो 'बिहू' के दिन अनिवार्य होता है। 'तिल पीठा' कहाँ जरूरी होता है। जुड़े में सफ़ेद और लाल रंग के पुष्प सजाना जरूरी होता है, जिसे यहाँ 'कोप्पो' फूल कहते हैं। अपनी समझ में इस बार भी वह हिन्दी में ही बोल रही होगी और मैं मूढ़ मति सो मूढ़ मति। समझ ही नहीं रहा हूँ। तब उस की बिटिया ने, अपनी माँ की असमिया मुझे हिन्दी में समझाई , जिसका हिन्दी निबंध पढ़ कर मैंने 'बिहू' की प्रारंभिक समझ पायी। मैंने 'पीठा' देखना चाहा कि कैसा होता है, कितने प्रकार का होता है ?'
-- हे देवता।' सानू को मेरी बुद्धि पर सचमुच तरस आया -- पीठा भी कोई देखने की चीज हुयी ? मैंने बताया नहीं कि, 'बिहू' के दिन 'तिल पीठा' खाना जरूरी होता है ? '
-- जाओ, जल्दी से स्नान कर के आओ। नये कपडे निकाल कर रखे हैं। फिर मेहमान को परोसो। सानू ने अरुण से कहा।
मुझे लगा, रूपवती गृहिणी ऐसे ही अपने बच्चों को भी अनुशासित करती होगी? उपनिषदों में (संभवतया वृहदारण्य उपनिषद में) एक जगह आटा है कि अमुक ऋषि (संभवतया लोमश ऋषि) ने कन्यादान के पश्चात विदा करते हुए अपनी शिष्या को यह आशीर्वाद दिया था-- जाओ, तुम्हारे दस पुत्र हों और ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो। लगता है, सानू वही ऋषि कन्या होगी जिसका ग्यारहवां पुत्र उसका पति है।
सानू ने मुझे पारंपरिक असमिया बुनावट वाला एक सुन्दर सा गमछा दिखाया और बताया किए इसे 'बिहुआन ' कहते हैं। बहिनें अपने भाइयों को यह 'बिहुआन' भेंट कर के आशीर्वाद मांगती हैं। इसके बाद ही भाई 'बिहू' में शामिल होने के ल्लिये घर से बाहर निकलते हैं। उसने कहा-- मैं आपको, यह दूगी।'
-- तभी मैं घर से बाहर निकल सकूंगा । है ना ? मैंने पूछा। अरुण डेका अब तक एक रहस्य छिपाए हुए था। वह, उस ने बता दिया-- ये भी तो बिहू नाचती थी।'
प्रमाण में उस ने घरेलू अल्बम के पन्ने उलट-पुलट कर वह चित्र भी दिखाया जिस में , 'बिहू' की पारंपरिक सज्जा में सजी-धजी , सानू सब से अलग दिख रही है।आलाक्तक रची हथेलियाँ, जुड़े में गुंथे हुए 'कोप्पो' फूल पर छाया कर रही हैं। कमर लोच ले रही है। बड़ी-बड़ी आँखों में एक दुर्निवार आमंत्रण है।
-- तो, इसे देख कर तुम मोहित हुए थे ?' मैंने पूछा। अरुण ने हाँ कहाँ और सानू ने आँखें तरेरीं। फिर हंसाने लगी। एक स्निग्ध हंसी। मैंने उस रूपसी से पूछा -- 'बिहू' नाच कर मुझे नहीं दिखाओगी ?'
-- हाँ दिखाऊंगी। आप रुकेंगे ?' उसने हाँ कहा और मुझसे पूछा । लेकिन, मैं कैसे रूक सकता हूँ ? मुझे तो लौटना है। तब बहिन ने विधि-विधान पूर्वक मुझे 'बिहुआन' भेंट किया और भूमि का स्पर्श कर के मुझे प्रणाम किया। 'बिहू' के दिन घर आये भाई को विदा देने के लिये कामरूप की वह रूपसी सड़क तक साथ आयी। अपने बच्चों के साथ उसका पति उसके पीछे-पीछे चला आ रहा था।
यह सब माया देख कर वह मुझ से कम हैरान नहीं था। ऊपर से एक नयी परेशानी मैंने उस पर लाद दी कि मैं फिर आऊँगा। तब मुझे अपनी स्टीमर पर बिठा कर ब्रम्हपुत्र की यात्रा कराना। अब तक मैंने ब्रम्हपुत्र का सौन्दर्य दूर से देखा है। अब उसका स्पर्श करना चाहता हूँ। असम, बंगाल और बंगला देश एक संयुक्त जल-संस्कृति से परस्पर आबद्ध हैं। हो सकता है कि ब्रम्हपुत्र के नाविक भी 'भटियाली' गीत गाना जानते हों जो उधर, हुगली मेघना के तटों को गुंजाते हैं।