मंगलवार, 22 मई 2012

अपने-अपने अज्ञेयः अरण्‍य - यात्रा

हिन्दी के एक शीर्ष साहित्यकार 'अज्ञेय' की जन्म-शती के अवसर को, अज्ञेय की ऊंचाइयों के अनुरूप सहित्योचित सार्थकता प्रदान करने के लिये अशोक वाजपेयी की अध्यक्षता में 'अज्ञेय जन्म शती समारोह समिति' का गठन किया गया, इस समिति ने, अज्ञेय के व्यक्तित्व और उनके साहित्यिक अवदान पर केन्द्रित संकलनों के प्रकाशन की ऐसी योजना बनायी , जो हमारे समक्ष और हम से सामने वाली पीढी के लिये, अज्ञेय को, उनकी ऐतिहासिकता में प्रस्तुत कर सकें.

इस योजना के अंतर्गत अज्ञेय से जुड़े और उन पर केन्द्रित संस्मरणों के संचयन और संपादन का दायित्व, हिन्दी दैनिक 'जनसत्ता' के संपादक और घुमक्कड़ साहित्यकार, ओम थानवी को सौंपा गया. श्री थानवी के संपादन में 'अपने-अपने अज्ञेय' शीर्षक से वह संचयन २ भागों में , वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित होकर अभी आया है. शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित उक्त संचयन में हिन्दी के ऐसे १०० (सौ) रचनाकारों के संस्मरण संकलित हैं जो या तो अज्ञेय के समकालीन रहे हैं या अज्ञेय के बाद के, अर्थात हमारे अपने समकालीन हैं. इनमें, छत्तीसगढ़ से, डा० राजेंद्र मिश्र और मेरे संस्मरण शामिल हैं.

अज्ञेय अपना ६५ वां जन्म दिन विदिशा में मनाने के लिये निकले थे, लेकिन हमने प्रपंच रच कर उन्हें बिलासपुर में रोक लिया था और उनके साथ अमरकंटक की यात्रा का एक ऐसा प्रसंग भी जुटा लिया था कि अज्ञेय २० मार्च को बिना किसी चूक के विदिशा पहुँच सकें. उनसे पहले इला जी वहाँ पहुँच चुकी थीं और उनकी प्रतीक्षा में थीं. भारतीय तिथि गणना के अनुसार, उस वर्ष (१९७५ में ) २० मार्च को ही अज्ञेय का जन्म दिन पड़ रहा था.

अमरकंटक की वह यात्रा अचानकमार के जंगलों से होकर हुयी थी, इसलिए वह अरण्य - यात्रा ही थी. और उस समय तक अचानकमार से लेकर अमरकंटक तक के जंगल अपने घनेपन के साथ सुरक्षित थे, इसलिए उस रास्ते से होकर गुजरना सचमुच की ही अरण्य-यात्रा थी. अब अचानकमार को 'टाइगर रिजर्व' का दर्जा मिल चुका है. दर्जा मिल गया, लेकिन जंगल कितना बच सका है? यह कहना मुश्किल भी है और दुखद भी. इसे, छत्रपति शिवाजी के 'सिंहगढ़ विजय' के उस ऐतिहासिक प्रसंग के जरिये समझने में सुविधा होगी, जब अपने सेनापति ताना जी मालसुरे की मृत्यु पर शोक विह्वल होकर शिवाजी ने कहा था -- गढ़ आला पण सिंह गेला ..' फिर भी, हिन्दी साहित्य के सन्दर्भों के लिये, १९७५ का वह यात्रा-प्रसंग आज ऐतिहासिक महत्त्व का हो चुका है.

ऐतिहासिक महत्त्व की उस यात्रा में, रायपुर के डा० राजेंद्र मिश्र और बिलासपुर के ही मेरे मित्र स्व० राम बाबू सोंथालिया साथ-साथ थे. सच तो ये है कि इन दोनों के बिना वह यात्रा हो ही ना पाती. उस समय टाइम्स ऑफ़ इंडिया (मुम्बई) के साप्ताहिक 'धर्मयुग' का प्रकाशन हो रहा था. और डा० धर्मवीर भारती उसका सम्पादन कर रहे थे. डा० धर्मवीर भारती ने उस यात्रा-प्रसंग को 'अमरकंटक; एक अरण्य यात्रा' अज्ञेय के साथ' शीर्षक देकर ( संभवतः मई-जून १९७५ के किन्हीं ) दो अंकों में प्रकाशित किया था. दुर्भाग्य से, या मेरी अपनी लापरवाही के चलते, वो दोनों अंक मेरे पास सुरक्षित नहीं हैं. लेकिन ओम थानवी जी ने अपने किन्हीं स्रोतों से वो विवरण प्राप्त कर लिये और 'अपने-अपने अज्ञेय' संचयन में उसे संकलित कर लिया.

अज्ञेय के जन्म शती वर्ष के स्मरण में प्रकाशित यह संकलन एक ऐतिहासिक संद्दर्भ ग्रन्थ है. दो भागों में प्रकाशित, १०५२ पृष्ठों के इस वृहत-संकलन का मूल्य १५०० रुपये है. और वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली ने इसे प्रकाशित किया है.

संचयन के पृष्‍ठ 664 से 671 पर उक्‍त आलेख इस तरह प्रकाशित है-



शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

सुआलकुसी की सानू ने मुझे ''बिहुआन' भेंट किया था.


असम के रंगीले पर्व 'बिहू' के अवसर पर आज मैं अपने उन सभी मित्रों के साथ , उन के उत्सव में शामिल होना चाहता हूँ,जो वहां इस पर्व को मना रहे होंगे और अपने उत्सव में मुझे शामिल करना चाहेंगे । अपने एक मित्र माखन लाल दास से तो मैं यह भी उम्मीद करता हूँ कि वो , इस पर्व पर मेरी बधाई और शुभ कामनाएं सुआलकुसी के अरुण डेका तक , उस की पत्नी सानू तक और उन के पूरे परिवार तक पहुंचाने का कोई उपाय भी करेंगे।
कुछ वर्षों पहले 'बिहू' मनाने के लिये मैं असम गया था। वहाँ हर कोई यह समझ रहा था कि मैं'बिहू' देखना चाहता हूँ। तब भूपेन हजारिका जीवित थे और उस वर्ष गुवाहाटी में 'बिहू उत्सव' के एक मंडप में , लता मंगेशकर के साथ उनके गायन का कार्यक्रम आयोजित था। जानकार लोगों ने मुझे सुझाया कि 'बिहू' देखने के लिये मुझे वहीं जाना चाहिए। यह बात मुझे निराश भी कर रही थी और उदास भी बना रही थी । या तो मैं अपनी भावनाएं उन तक नहीं पहुंचा पा रहा था या फिर मुझे मंजूर नहीं किया जा रहा था।
वहाँ, डिब्रूगढ़ में अंग्रेजी की प्राध्यापिका और प्रसिद्द उपन्या 'स्वर्णलता' की पुरस्कृत लेखिका डाक्टर तिलोत्तमा मिश्र ने बताया कि 'बिहू' का पारंपरिक रूप अभी ऊपरी असम के इस हिस्से में बचा हुआ है लेकिन उग्रवादी गतिविधियों के किसी भी बाहरी के लिये सुरक्षा को संदिग्ध बना दिया है। अलबत्ता, उनके साथ इस विषय पर मेरी अच्छी बातचीत हो सकी कि लोक कला रूपों का 'मंडप' पर पहुँचना और उसका प्रदर्शनात्मक (फरमाइशी) हो जाना उस कला-रूप के लिये कितना हितकारी है अथवा नहीं।
तब अपनी निराशा और उदासी से बचाने का एक उपाय मैं ने किया था और, असम के विश्व प्रसिद्द रेशम 'मूगा' के गाँव -- सुआलकुसी जा पहुंचा। वहां मैं किसी को नहीं जानता था। लेकिन मेरे पास एक विश्वास था कि 'बिहू' ग्राम्य संस्कृति का पर्व है, इसलिए एक पारंपरिक गाँव में उसकी परम्परा अभी, किसी ना किसी रूप में बाकी होगी। और शायद वहाँ मुझे शामिल भी किया जा सकेगा। वहाँ अरुण डेका मुझे मिला , जिसके साथ, पहले कभी मैं नहीं मिला था। अरुण डेका ने और उसकी पत्नी सानू ने और उन के पूरे परिवार ने मुझे जिस तरह अपनाया व मेरे विश्वास से कहीं अधिक था जिसे सम्हाल पाना मेरे लिये भारी था। तब भी और आज भी है। एक ही सूरत बची थी कि वह स्नेहसिक्त अपनापन मैं अपने साथ ले आऊँ और अपनी उन स्मृतियों में सम्हाल लूं जो कभी धूमिल नहीं होंगी। वह हरापन अभी तक वैसे का वैसा हरा और गीला बना हुआ है।
कोलकता से प्रकाशित होने वाले हिंदी मासिक 'वागर्थ' के तत्कालीन संपादक डाक्टर प्रभाकर श्रोत्रिय ने असम का मेरा यात्रा संस्मरण 'मायावी, कामरूप का रूप' अपने यहाँ लिया था। उसके कुछ अंश 'बिहू' के अवसर पर मैं अपने उन सभी मित्रों के साथ साझा करना चाहूगा, जो 'बिहू' मनाते हैं और किसी को अपने साथ शामिल करने में विश्वास करते हैं। मुझे विश्वास है कि दिसंबर २००१ के 'वागर्थ' के पृष्ठ क्रमांक ७५ और ७६ के ये कुछ अंश आपको भी स्पर्श करेंगे--
अरुण डेका का पूरा परिवार मेरे पास जुट गया है। मुझे लगा कि निबंध पढ़ कर 'बिहू' को समझने प्रयास कर रहा एक अतिथि उन के लिये अचरज पैदा कर रहा होगा। लेकिन अरुण की पत्नी ने सब सहज बना दिया। उसका नाम सानू है। सानू रूपवती है और घर में उस की चलती है। घर में अरुण भी, मुझे, उस पर आश्रित दिखा। मैंने सानू से पूछा -- 'बिहू' में क्या क्या होता है ?'
सानू समझाने लगी- सुबह उठ कर नदी में स्नान करते हैं । नये कपडे पहिनते हैं। 'नाम घर' में जा कर पूजा करते हैं। गाय की पूजा करते हैं। उसको खिलाते हैं। 'पीठा' खाते हैं। फिर घरों में जाकर 'बिहू-बिहू' पुकारते हैं। और नाचते हैं। दान ग्रहण करते हैं। '
(पृष्ट ७५)
इस परिवार में, जहाँ मैं अकस्मात् ही अतिथि हूँ, कौन भक्त होगा और कौन परम भक्त ? सोचता हूँ तो उलझता हूँ। बिमल मित्र का बंगला उपन्यास 'पति परम गुरु'। यहाँ, वह गुरु ना कुछ सस्मझ रहा है न कुछ समझा रहा है। समझना-समझाना जो भी है, वह पत्नी ही कर रही है।
अपनी समझ में सानू, मुझे हिंदी में ही समझा रही होगी। फिर भी मैं मूढ़ मति, समझ नहीं रहा हूँ। इस पर उस ने झुंझलाहट से देखा। तब अरुण ने उसे बतलाया कि वह तो असमिया में बोले जा रही है। इस पर वह अपने पति पर नाराज हो गयी -- तो फिर, तुम क्या कर रहे थे ?'
अरुण हंसने लगा-- तेरे सामने मेरी क्या चलती है ?'
मेरा अनुमान प्रमाणित हो गया कि घर में सानू की ही चलती है। वह फिर बताने लगी-- जो 'बिहू' के दिन अनिवार्य होता है। 'तिल पीठा' कहाँ जरूरी होता है। जुड़े में सफ़ेद और लाल रंग के पुष्प सजाना जरूरी होता है, जिसे यहाँ 'कोप्पो' फूल कहते हैं। अपनी समझ में इस बार भी वह हिन्दी में ही बोल रही होगी और मैं मूढ़ मति सो मूढ़ मति। समझ ही नहीं रहा हूँ। तब उस की बिटिया ने, अपनी माँ की असमिया मुझे हिन्दी में समझाई , जिसका हिन्दी निबंध पढ़ कर मैंने 'बिहू' की प्रारंभिक समझ पायी। मैंने 'पीठा' देखना चाहा कि कैसा होता है, कितने प्रकार का होता है ?'
-- हे देवता।' सानू को मेरी बुद्धि पर सचमुच तरस आया -- पीठा भी कोई देखने की चीज हुयी ? मैंने बताया नहीं कि, 'बिहू' के दिन 'तिल पीठा' खाना जरूरी होता है ? '
-- जाओ, जल्दी से स्नान कर के आओ। नये कपडे निकाल कर रखे हैं। फिर मेहमान को परोसो। सानू ने अरुण से कहा।
मुझे लगा, रूपवती गृहिणी ऐसे ही अपने बच्चों को भी अनुशासित करती होगी? उपनिषदों में (संभवतया वृहदारण्य उपनिषद में) एक जगह आटा है कि अमुक ऋषि (संभवतया लोमश ऋषि) ने कन्यादान के पश्चात विदा करते हुए अपनी शिष्या को यह आशीर्वाद दिया था-- जाओ, तुम्हारे दस पुत्र हों और ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो। लगता है, सानू वही ऋषि कन्या होगी जिसका ग्यारहवां पुत्र उसका पति है।
सानू ने मुझे पारंपरिक असमिया बुनावट वाला एक सुन्दर सा गमछा दिखाया और बताया किए इसे 'बिहुआन ' कहते हैं। बहिनें अपने भाइयों को यह 'बिहुआन' भेंट कर के आशीर्वाद मांगती हैं। इसके बाद ही भाई 'बिहू' में शामिल होने के ल्लिये घर से बाहर निकलते हैं। उसने कहा-- मैं आपको, यह दूगी।'
-- तभी मैं घर से बाहर निकल सकूंगा । है ना ? मैंने पूछा। अरुण डेका अब तक एक रहस्य छिपाए हुए था। वह, उस ने बता दिया-- ये भी तो बिहू नाचती थी।'
प्रमाण में उस ने घरेलू अल्बम के पन्ने उलट-पुलट कर वह चित्र भी दिखाया जिस में , 'बिहू' की पारंपरिक सज्जा में सजी-धजी , सानू सब से अलग दिख रही है।आलाक्तक रची हथेलियाँ, जुड़े में गुंथे हुए 'कोप्पो' फूल पर छाया कर रही हैं। कमर लोच ले रही है। बड़ी-बड़ी आँखों में एक दुर्निवार आमंत्रण है।
-- तो, इसे देख कर तुम मोहित हुए थे ?' मैंने पूछा। अरुण ने हाँ कहाँ और सानू ने आँखें तरेरीं। फिर हंसाने लगी। एक स्निग्ध हंसी। मैंने उस रूपसी से पूछा -- 'बिहू' नाच कर मुझे नहीं दिखाओगी ?'
-- हाँ दिखाऊंगी। आप रुकेंगे ?' उसने हाँ कहा और मुझसे पूछा । लेकिन, मैं कैसे रूक सकता हूँ ? मुझे तो लौटना है। तब बहिन ने विधि-विधान पूर्वक मुझे 'बिहुआन' भेंट किया और भूमि का स्पर्श कर के मुझे प्रणाम किया। 'बिहू' के दिन घर आये भाई को विदा देने के लिये कामरूप की वह रूपसी सड़क तक साथ आयी। अपने बच्चों के साथ उसका पति उसके पीछे-पीछे चला आ रहा था।
यह सब माया देख कर वह मुझ से कम हैरान नहीं था। ऊपर से एक नयी परेशानी मैंने उस पर लाद दी कि मैं फिर आऊँगा। तब मुझे अपनी स्टीमर पर बिठा कर ब्रम्हपुत्र की यात्रा कराना। अब तक मैंने ब्रम्हपुत्र का सौन्दर्य दूर से देखा है। अब उसका स्पर्श करना चाहता हूँ। असम, बंगाल और बंगला देश एक संयुक्त जल-संस्कृति से परस्पर आबद्ध हैं। हो सकता है कि ब्रम्हपुत्र के नाविक भी 'भटियाली' गीत गाना जानते हों जो उधर, हुगली मेघना के तटों को गुंजाते हैं।

मंगलवार, 14 फरवरी 2012

पतझड़ की धुन


गुनगुना रहा है /
एक धुन वीतराग/
वहाँ पतझड़ का मन /
मेरे पास आओ /
मुझे पता है /
वह जगह /
वहाँ खिला है /
एक फूल /
सुर्ख सेमल ।

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

सुरसतिया के कथा देश में


वित्तीय क्षेत्र में , पिछले कई वर्षों से दक्षिण पूर्व रेलवे का बिलासपुर मंडल , भारतीय रेल के लिये सर्वाधिक आय अर्जित करने का महत्त्व पा रहा है। इधर साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में भी कुछ महत्वपूर्ण शुरुआत हुयी है। हिन्दी के क्षेत्र में विशेष रूप से।
राष्ट्रीयकरण से पहले वाला बंगाल-नागपुर रेलवे अब दक्षिण-पूर्व रेलवे के अंतर्गत आता है। भाषा की दृष्टि से बिलासपुर रेल मंडल (डिवीजन) का प्रत्यक्ष संपर्क ओडिया, तेलुगु और मराठी भाषी प्रसारों के साथ है। आजादी के फ़ौरन बाद शरन्यक की तलाश में आये पंजाबी और बंग भाषी लोगों को भी उस समय सब से अधिक रेलवे की सेवाओं में ही खपाया जा सका था। अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में तमिल और मलयालम बोलने वालों क्र नाम भी बहुत बड़ी तादाद में इस रेल मंडल के वेतन भुगतान प्रपत्र (पे रोल ) पर दर्ज हैं । इस तरह, संभवतः भाषाई आधार पर बिलासपुर रेल मंडल के अंतर्गत सर्वाधिक विभिन्न भाषाओं वाली आबादी निवास करती है। इसलिए, यहाँ हिन्दी के सम्बन्ध में शासकीय अथवा सांस्कृतिक स्तर पर किये गए किन्हीं भी कार्यों के महत्त्व को परिणाम के साथ जोड़ कर देखा-परखा जा सकता है।
त्रिभाषा फार्मूले के अनुसार बिलासपुर रेल मंडल अपने कर्मचारियों के लिये हिन्दी और उर्दू के अतिरिक्त बंगला,ओडिया, मराठी,तमिल, तेलुगु और मलयालम भाषाओं की कक्षाएं चला रहा है। इन भाषाओं की बाकायदा परीक्षाएं होती हैं और इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले कर्मचारियों के लिये उचित 'प्रोत्साहन' (इंसेंटिव ) का प्रावधान है ।
हिन्दी में विकास को गति प्रदान करने के लिये दक्षिण-पूर्व रेलवे ने विवेकशील प्रयास किये हैं । पिछले वर्ष जब हिन्दी दिवस (१४ सितम्बर) में रेलवे के अंतर्गत होने वाले लिखा-पढी के 'अधिकतम संभव' कार्यों को हिन्दी में निपटाने का लक्ष्य निर्धारित किया जा रहा था , उस समय दक्षिण पूर्व रेलवे ने इस बात की सतर्कता रखी कि टिकट खिड़कियों से अथवा चलती रेल में बनायी जाने वाली रसीदें भी यथासंभव हिन्दी में लिखी जाएँ -- लेकिन ध्यान रखा जाए कि वहाँ हिन्दी पढी जा सकती है ।
बिलासपुर रेल मंडल ने इन विवेकशील प्रयासों को साहित्यिक और सांस्कृतिक स्वरुप प्रदान किया है । यह अकेला रेल मंडल है जो हिन्दी भाषा में नियमित रूप से एक साहित्यिक त्रैमासिक (पत्रिका) 'दीक्षा ' का प्रकाशन कर रहा है ।
इस वर्ष २३ से ३० जनवरी तक बिलासपुर रेल मंडल ने हिन्दी सप्ताह आयोजित किया और समारोह के उदघाटन के लिये बंगला उपन्यासकार श्री विमल मित्र को अपने यहाँ आमंत्रित किया। विमल मित्र का बिलासपुर आना इस समारोह से सम्बंधित पक्षों को बहुकोणीय दृष्टि देता है। एक तो यह कि हिन्दी सप्ताह का उदघाटन साहित्य का एक व्यक्ति कर रहा था। दूसरा यह कि वह व्यक्ति अहिन्दी भाषी है। तीसरा यह कि विमल मित्र का बिलासपुर के साथ डेढ़ दशक जितना पुराना सम्बन्ध है। बहुत बरस पहले वह यहाँ रेल विभाग की नौकरी (स्वयं विमल मित्र द्वारा प्रयुक्त शब्द) में थे। यह किसी आकस्मिक संयोग से बहुत आगे की बात है कि आज ऊन्हें सम्मान वहाँ मिल रहा था जो स्थान उनके प्रारम्भिक जीवन के साथ सीधे जुडा हुआ है।
'सुरसतिया' के शिल्प और सूत्र विमल मित्र के बिलासपुर के जीवन अनुभवों से जुड़े हैं। इस उपन्यास में 'सुरसतिया' के चरित्र चित्रण को लेकर , बाद में छत्तीसगढ़ में बड़ी प्रतिक्रया हुयी थी। और रायपुर में तो उस पत्र (साप्ताहिक हिन्दुस्तान ) की प्रतियां भी जलाई गयी थीं , जिसमें यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था। आशंका थी कि सुरसतिया के कथा देश में सम्मान के दौरान उपन्यासकार का सामना सुरसतिया के विवादग्रस्त प्रश्नों से होगा। लेकिन एक अच्छी बात यह हुयी कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। बिलासपुर आने के बाद विमल मित्र रायपुर गए थे । और भिलाई भी, जहां उनकी 'लड़की की लड़की' रहती है , जो अभी छोटी बच्ची है और जिसे वह बहुत प्यार करते हैं। वहाँ भी कोई आशंकित मुठभेड़ नहीं हुयी। अलबत्ता हिन्दी तथा बंगला पाठकों की संख्या और विमल मित्र के 'उपन्यासों के बाजार' से समबन्धित कुछ प्रश्न वहाँ के स्थानीय पत्रों की ओर से किये गए।
विमल मित्र ने बताया कि हिन्दी बाजार के मुकाबले उनके उपन्यास बंगाल में अधिक बिकते हैं , क्योंकि वहाँ किताबें खरीद कर पढ़ने वाले पाठकों का एक बहुत बड़ा समुदाय रहता है। और साहित्य पढ़ने वाले उस समुदाय के निर्माण का श्री उन्होंने रविन्द्र बाबू को दिया।
यहाँ आकर बात थोड़े उलझाव में पडी क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में रविन्द्र नाथ ठाकुर और शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनात्मक प्रवृत्तियों को सामंतवाद और जनवाद के चौखटे में कस कर पुनरीक्षित करने के सुगठित प्रयास हुए हैं। विमल मित्र ने इन प्रयासों के सम्बन्ध में कुछ न कह कर एक बात कही कि रविन्द्र बाबू लेखकों के लेखक थे और शरत पाठकों के लेखक थे।
समारोह का उदघाटन करते हुए अपने भाषण में उन्होंने कहा था -- मैं कहानी लिखता हूँ इसलिए अपनी बात कहानी में कहूंगा। और उन्होंने पंचतंत्र की वह कहानी सुनायी कि मनुष्य ने किस तरह कुटिलता पूर्वक बैल, गधे और कुत्ते के जीवन -बर्ष अपने लिये हथिया लिये । इस कहानी के बाद उन्होंने कहा -- अब मैं कुत्ते का जीवन जी रहा हूँ ।
फिर उन्होंने अपना मंतव्य स्पष्ट किया कि जिस तरह कुत्ता चौकसी का काम करता है, जीवन के इस चौथे हिस्से में पहुँच कर वह भी चौकसी का काम कर रहे हैं। जो कुछ आस-पास घाट रहा है, साहित्य में हो रहा है उस पर वह दृष्टि रखे हुए हैं । अपनी हिन्दी के सम्बन्ध में विमल मित्र ने एक रोचक बात बतायी -- मैं हिन्दी में पत्र लिखता हूँ, अपनी उस नातिन के लिये जो भिलाई में रहती है और मुझे हिन्दी में ही लिखती है। '
इस बात को एक पारिवारिक संस्मरण से आगे ले जा कर विचार करें तो इसका अर्थ एकदम साफ़ हो जाता है कि हिन्दी आगामी पीढी की भाषा है।

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( मेरी यह समाचार- टिप्पणी टाइम्स ऑफ़ इंडिया, नयी दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिन्दी समाचार साप्ताहिक 'दिनमान' -- संपादक , रघुवीर सहाय , २६ मार्च-` अप्रैल १९७८, के अंक में प्रकाशित हुयी थी। उस समय बिलासपुर रेल मंडल दक्षिण पूर्व रेल के अंतर्गत था। )

सोमवार, 23 जनवरी 2012

बस्तर में रेल : जिस रास्ते राजा आया था



{बस्तर में रेल सुविधाओं के विस्तार के लिये 'रेल रोको' आन्दोलन चला और समझौता भी हो गया । भारतीय रेल के मान-चित्र में बस्तर १९६७ में में शामिल हुआ । तब वह एक ऐतिहासिक घटना थी । जिस दुर्गम रास्ते से होकर यह रेल लाइन बिछाई गयी वह बेहद जटिल था और किसी भी रेल - तकनीक के लिये चुनौती भरा था । उस चुनौती के मुकाबले के लिये रेलवे ने उतने ही जटिल कौशल का प्रयोग किया । और दुनिया के सामने भारतीय रेलवे इंजीनिअरिंग की क्षमताओं को प्रमाणित किया । इस रेल पथ की एक दिलचस्प ऐतिहासिकता यह भी है बस्तर में काकतीय राजवंश के संस्थापक अन्नं दो प्रथम ने भी बस्तर-प्रवेश के लिये लगभग यही रास्ता पकड़ा था।
'दिनमान' (समाचार साप्ताहिक, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रकाशन समूह, नयी दिल्ली , तत्कालीन संपादक -- रघुवीर सही । ) के सितम्बर-अक्टूबर १९७६ के किसी अंक में -- ' बस्तर में रेल : जिस रास्ते राजा आया था ' - शीर्षक से प्रकाशित मेरा आलेख उस सन्दर्भ को ताजा कर सकेगा । }

अंततः पहली सितम्बर (१९७६) से बस्तर का आदिवासी बहुल सैरगाह अब रेल यात्रियों के लिये खुल गया । इस से पहले बस्तर के बीहड़ रेल पथ पर केवल माल गाड़ियां दौड़ती थीं । बैलाडीला का लौह-अयस्क ले कर विशाखा- पत्तनंम तक, जहाजी लदान के लिये । किरन्दूल से वाल्टेयर तक ४७१ किलोमीटर लम्बे , लगभग २९ घंटे की यात्रा वाले इस रेल पथ पर ४६ सुरंगें तथा १५ छतदार मार्ग हैं , ८७ बड़े पुल और १२३६ पुलिया हैं । प्रायः समुद्र तल से प्रारम्भ होने वाला यह रेल पथ शमलीगुडा नामक स्टेशन पर ९९७ मीटर की सर्वाधिक ऊंचाई को स्पर्श करता है । भारतीय रेलवे के , बड़ी लाइन पर स्थित स्टेशनों में यह सर्वाधिक ऊंचाई है ।
यह तो हुयी तक्नीकी जानकारी । लेकिन इस के अलावा कुछ और भे बातें हैं जिन के चलते , माल-परिवहन के लिये १९६७ से प्रारंभ इस रेल-पथ पर यात्रियों की आवा-जाही निषिद्ध रही । पिछले वर्ष बस्तर की प्रसिद्द नारायणपुर मडई ( आदिवासी मेला ) में भारतीय स्टेट बैंक के जनरल मैनेजर (प्लानिंग ) ए० एम० मारिअप्पन अपने सहायक अधिकारीयों के एक दल के साथ बस्तर में ग्रामीण-वित्त के अध्ययन के सिलसिले में बस्तर आये हुए थे । मुझे उन के साथ बात करने का अवसर मिला था । उस समय बस्तर में रेल -यात्रा के प्रश्न को ले कर बस्तर के हितैषियों और हितैषियों के बीच विवाद की स्थिति थी । श्री मारिअप्पन के बस्तर - अवलोकन का एक अर्थशास्त्रीय निचोड़ यह था कि जब तक एक निश्चित सीमा तक बस्तर का विकास सुनिश्चित नहीं हो जाता तब तक इसके दक्षिण प्रवेश-द्वार को बंद रखना बस्तर के हित में होगा।
अब बस्तर की भौगलिक स्थितिपर ध्यान दें तो समझने में आसानी होगी । पूर्व में ओडिशा, पश्चिम में महाराष्ट्र और दक्षिण में आंध्र प्रदेश की सीमा-रेखाओं की भागीदारी से निर्मित यह आदिवासी एकांत-द्वीप १ सितम्बर (१९७६) के पूर्व तक केवल उत्तर दिशा की ओर से खुला हुआ था । मध्य प्रदेश की चौहद्दी के भीतर दुबका हुआ । इस के बावजूद दक्षिण की ओर से आंध्र प्रदेशके व्यापारी कारों में भर कर आते थे और दक्षिण बस्तर की ईमारती लकडियाँ नदी के रास्ते बहा कर ले जाते रहे । प्राकृतिक वन संपदा की दृष्टि से सम्पूर्ण बस्तर में दक्षिण बस्तर का इलाका सब से धनी है । तथा शेष मैदानी इलाकों से आने वाले सैलानियों के लिये , अब तक अबूझ रहा आया, अबूझमाड भी इसी दक्षिण बस्तर में है । और कोंटा तथा भोपालपट्नम तक नौ-परिवहन की सुविधा भी, शायद पूरे मध्यप्रदेश में अकेले यहीं है । लकड़ी के व्यापारियों के साथ-साथ आंध्रप्रदेश के सूदखोरों की बड़ी घुस-पैठ भी बस्तर में हुयी। उस घुस-पैठ ने अशिक्षित और असंगठित बस्तरी अर्थ-व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया था । नारायणपुर की मडई में श्री मारिअप्पन के साथ हुयी अनौपचारिक चर्चा का एक निष्कर्ष यह था कि दक्षिण की तरफ बस्तर का खुलना बस्तर में शोषण की गतिविधियों को ही गति प्रदान करेगा ।
बस्तर और आंध्र के सम्बन्ध साँस्कृतिक भी हैं और इनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है । बस्तर का राजवंश, जिसकी अंतिम कड़ी प्रवीर चन्द्र भंजदेव थे , काकतीय राजवंश कहलाता है । वस्तुतः काकतीय बंश के राजपुरुष बस्तर की जमीन के मूल निवासी नहीं थे। बल्कि दक्षिण में वारंगल से चल कर बस्तर में आये थे ।अन्नंम देव (प्रथम) इस वंश का प्रथम राजपुरुष हुआ जिस ने बस्तर में प्रवेश किया। उस समय किया यहाँ (दक्षिण कोसल अथवा छत्तीसगढ़ में) नागपुर के भोंसला राजाओं का आधिपत्य था । उत्तर दिशा से होकर बस्तर में प्रवेश के लिये , बाहर से आने वाले किसी को भी , पहले पूरा छत्तीसगढ़ पार करना पड़ता । और इसके लिये उसे भोंसला शाशकों से भिड़ना पड़ता । अन्नं देव ने इस टकराहट को बरकाने की दृष्टि से, दक्षिण का बीहड़, अनगढ़ और जंगली रास्ता पकड़ा था । बस्तर का रेल-पथ, कमोबेश वही है । किसी सैलानी के लिये अथवा एक सामान्य यात्री के लिये भी, जिस में इतिहास-बोध है, यह जानना कम रोमांचक नहीं होगा कि वह उसी रास्ते पर यात्रा कर रहा है , जिस पर से होकर कभी राजा आया था । और वह बस्तर का पहला राजा था ।
अपने इतिहास और सांस्कृतिक परम्पराओं का बोध कराने वाली प्रतिनिधि रेलों , यथा -- मेवाड़ में 'चेतक एक्सप्रेस', गुजरात की 'साबरमती एक्सप्रेस' अथवा अभी हाल ही में गोंदिया-जबलपुर के मध्य दौडाई गयी 'सतपुडा एक्सप्रेस ' -- की परम्परा में बस्तर की इस प्रथम यात्री रेल का भी कोई ऐसा गौरवशाली नाम सोचा जा सकता है । काकतीय राजवंश की अधिष्ठात्री देवी -- दंतेश्वरी बस्तर के सामान्य जनों को भी उतनी ही मान्य हैं । यदि इस तरह को कोई सर्व-मान्य नाम इस यात्री-रेल को मिलता है तोवह प्रातिनिधिक भी होगा और दोराज्यों के आपसी संबंधों की परम्परा को रेखांकित भी करेगा ।

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